16 Sanskar, सनातन धर्म में सोलह संस्कारों की संपूर्ण व्याख्या विस्तार से

सनातन धर्म में सोलह संस्कार एवं व्यक्तित्व विकास व्याख्या, सनातन धर्म के 16 संस्कारों की संपूर्ण व्याख्या 16 Sanskar व्यक्ति के गर्व से अंतिम संस्कार तक क्या कैसे किए जाते हैं? संपूर्ण 16 Sanskar की विस्तृत व्याख्या, जानेंगे संस्कार क्या है? कितने जीवन में Sanskar होते हैं? क्रमबद्ध तरीके से संपूर्ण सोलह संस्कारों की व्याख्या पड़ेंगे, पोस्ट को पूरा पढ़ें यह जानकारी बहुत ही उपयोगी है।

संस्कार क्या है? (Sanskar Kya Hai)

भारतीय ऋषि-मुनियों ने मनुष्य के सम्पूर्ण व्यक्तित्व की श्रेष्ठता के लिए कुछ ऐसे सूक्ष्म उपचारों का आविष्कार किया जिनका प्रभाव शरीर तथा मन पर ही नहीं वरन् सूक्ष्म अन्तःकरण पर भी पड़ता है। इस प्रभाव के कारण मनुष्य का व्यक्तित्व, गुण, कर्म, स्वभाव एवं आध्यात्मिक दृष्टि से समुन्नत होता है। इसी आध्यात्मिक उपचार को संस्कार कहा जाता है। सर्वप्रथम ऋग्वेद Sanskar शब्द को प्रयुक्त किया गया जिसका आशय वहाँ धर्म की शुद्धता-पवित्रता के रूप में लिया गया। मीमांसा दर्शन भाष्य में शबरमुनि ने स्पष्ट किया कि”

” संस्कारों नाम स भवति यस्मिन् जाते, पदार्थो भवति योग्यः कस्यचिदर्थस्य”

इसका तात्पर्य यह है कि संस्कार वह प्रक्रिया है, जिसके होने से कोई व्यक्ति या पदार्थ किसी कार्य के योग्य हो जाता है।इसी प्रकार कुमारित्र भट्ट द्वारा रचित तंत्र कार्तिक में कहा गया है कि:-“योग्यतां चादधानाः क्रियाः संस्कारा इत्युच्यन्ते” तात्पर्य है… Sanskar वे क्रियाएँ तथा रीतियाँ हैं जो योग्यता प्रदान करती है।

संस्कारों का महत्त्व (Sanskaro Ka Mahatv)

सनातन धर्म की संस्कृति संस्कारों (Sanskaro) पर आधारित है। भारतीय तत्ववेत्ताओं और ऋषियों-मुनियों न मनुष्य जीवन को पवित्र और मर्यादित स्वरूप प्रदान करने के लिए संस्कारों का आविष्कार किया जनहित के सम्पूर्ण व्यक्तित्व निर्माण व विकास में धार्मिक ही नहीं वरन् वैज्ञानिक दृष्टि से भी इन Sanskar का विशेष महत्त्व है।

16 Sanskar

व्यक्तित्व की पूर्णता प्रदान करने में इन संस्कारों (Sanskaro) का महत्त्वपूर्ण अवदान है। इस संस्कार के माध्यम से जहाँ एक ओर शिशु के पूर्व जन्मों से आये धर्म और कर्म से सम्बद्ध योग तथा गर्भ में विकृतियों के परिष्कार के लिए क्रियाएँ व रीतियाँ सम्पन्न की जाती है वहीं दूसरी ओर मनुष्य के सप्तगणों की आवद्धि की जाती है तथा कोम्बिक जीवन को सुविकांगता किया जाता है। यही कारण क व्यक्तित्व के पर्ण विकास में संस्कारों का आश्चर्यजनक प्रभाव पड़ता।

घोडश संस्कारः (Solah-16 Sanskar)

सनातन धर्म के अनुसार सरकार 16 प्रकार के है, इन्हें ही ‘पोडश Sanskar’ कहा जाता है। माता के गर्व में आने के दिन से लेकर मत्यु तक की अवधि में समय-समय पर प्रत्येक सनातन धर्मावलम्बों को 16 बार संस्कारित किया जाता है। इससे व्यक्तित्व को उच्च स्तरीय पूर्णता प्रदान की जाती है। ये 16 Sanskar (सोलह संस्कार) निम्नानुसार है।

  1. गर्भाधान, 2. पुसवन, 3. सीमन्तोन्नयन, 4. जातकर्म, 5. नामकरण, 6. निष्क्रमण, 7. अन्नप्राशन, 8. चूडाकर्म (मुण्डन संस्कार) , 9. विद्याराभ, 10. कर्णवेघ, 11. यज्ञोपवीत, 12. वेदारम्भ, 13. केशान्त, 14. समावर्तन, 15. विवाह, 16. अन्त्योष्ट,

1-गर्भाधान संस्कारः (Gabhradhan Sanskar)

शास्त्रो में मान्य 16 संस्कारों (16 Sanskar) में से गर्भाधान संस्कार प्रथम संस्कार है। गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने के पश्चात् प्रथम परम कर्तव्य स्वरूप इस संस्कार को अधिमान्यता प्रदान की गई है। गृहस्थ जोवन व्यतीत करते हुए मनुष्य का मुख्य उद्देश्य श्रोष्ठ सन्तानोत्पत्ति करना होता है। उत्तम सन्तान की प्राप्ति के लिए माता-पिता को गर्भाधान से पहले अपने तन और मन की पवित्रता के लिए इस सस्कार का पालन करना पड़ता है।

2-पुसवन संस्कार (Pusavan Sanskar)

गर्भाधान के दूसरे अथवा तीसरे माह में पुंसवन संस्कार करने का विधान है। गर्भस्थ शिशु के समाचत विकास के लिए गर्भिणी का यह Sanskar किया जाता है। इसके अतिरिक्त गर्भस्थ शिश के मानसिक विकास की दृष्टि से भी यह संस्कार अत्यधिक उपयोगी माना गया है।

पुसवन संस्कार का उद्देश्य स्वास्थ्य व उत्तम सन्तानको जन्म देना है। विशेष तिथिगाव ग्रहों की गणना के आधार पर ही गर्भाधान करना धर्माचित माना गया है। बालक को संस्कार वान बनाने के लिए यह भी आवश्यक है कि जन्मदाता माता पिता भी सुसंस्कारित होना चाहिए।

3-सीमन्तोनयन संस्कार (Simantonamay Sanskar)

सीमन्तोन्नयन सस्कार को सीमन्तकरण संस्कार अथवा सीमन्त Sanskar के रूप में भी जाना है। सीमन्तोनयन का अर्थ होता है सौभाग्य संपन्न होना, गर्भस्थ शिशु एवं उसकी माता की रक्षा करना भी इस प्रकार का मुख्य ध्वये होता है।

गर्भपात रोकने के उपाय भी इस संस्कार में किये जाते है। इस Sanskar के अन्तर्गत गर्भवती महिला को प्रसन्नचित्त रखने के लिए भाग्यशाली महिलाएँ उचित जतन करती है और गर्भवती महिला की मांग भरती है। यह संस्कार गर्भधान के छठवें या आठवें माह में किया जाता है।

4-जातकर्म संस्कार (Jatkarm Sanskar)

यह संस्कार शिशु के जन्म के तुरन्त पश्चात् ही जातकर्म संस्कार किये जाने का विधान है। जन्मे शिशु के नालच्छेदन से पहले जातकर्म Sanskar को सम्पन्न किया जाता है। इस लौकिक संसार के सीधे सम्पर्क में आने वाले शिशु को शक्ति, मेधा एवं सुदीर्घ जीवन के लिए शहद एवं धी वैदिक मंत्री के उच्चारण के साथ चटाया जाता है।

छह बून्द शहद और दो बून्द शुद्ध घी को मिला कर मन्त्रोच्चार के साथ चटाने के पश्चात् जन्मदाता पिता यज्ञ करता है तथा माता निर्धारित नौ मंत्रों का उच्चारण कर शिशु के बुद्धिमान, बलवान, स्वस्थ और सुदीर्घजीवी होने की प्रार्थना करती है। ऐसी प्रार्थना के पश्चात् शिशु की माता शिशु को स्तनपान करवाती है।

5-नामकरण संस्कारः (Naamkarn Sanskar)

नामकरण शिशु के जन्म के पश्चात् प्रथम Sanskar कहा जाता है। सामान्यतया यह संस्कार जन्म के ग्यारहवें दिन किया जाता है। ऋषियों और धर्माचार्यों ने शिशु के जन्म लेने के 10 दिन तक की अवधि को सूतक के रूप में माना है। यही कारण है कि नामकरण संस्कार ग्यारहवें दिन किये जाने का विधान है।

किसी भी व्यक्ति के नाम का उसके व्यक्तित्व के विकास से प्रत्यक्ष एवं घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। नाम सार्थक बनाने की हल्की अभिलाषाएँ मन में जागती रहती हैं। नाम पुकारने वाले भी उसी नाम के अनुरूप उसके व्यक्तित्व की कल्पना गढ़ते हैं। इसके साथहो-साथ सनातन धर्म में नामकरण संस्कार का अत्यधिक महत्त्व है। ज्योतिष विज्ञानी और मनोवैज्ञानिक नाम को व्यक्तित्व विकास का महत्त्वपूर्ण अंग मानते हैं।

6-निष्क्रमण संस्कारः (Nishkraman Sanskar)

निष्क्रमण संस्कार का तात्पर्य होता है-बाहर निकलना। इस Sanskar के अन्तर्गत शिशु को सूर्य और चन्द्रमा के प्रकाश से परिचित कराया जाता है। सूर्यदेव के तेज और चन्द्रमा को शीतलता से शिशु को रूबरू कराया जाता है। इससे बालक की नैसर्गिक जगत से निकटता बढ़ती है। इससे बालक लम्बी आयु तक धर्म और मर्यादा की रक्षा करने में सक्षम होता है।

इस संस्कार के माध्यम से बालक के व्यक्तित्व को तेजस्वी और विनयशील बनाया जाता है। देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना और दर्शन से दीर्घ, यशस्वी एवं स्वस्थ जीवन की मनोकामना की जाती है। शिशु के चतुर्थ मास में इस Sanskar को सम्पन्न करने का विधान है।

तीन महीने तक शिशु को घर में रखा जाता है क्योंकि इस अवधि में बालक तेज हवा, धूप व बाह्य परिवेश से सामना करने के लिए सक्षम नहीं होता है। इस संस्कार का यही प्रयोजन है कि बालक धीरे-धीरे समाज के सम्पर्क में आकर समाज और सामाजिक परिवेश से परिचित हो सके। इसका प्रभाव यह होता है कि इससे बालक के व्यक्तित्व में सामाजिकता की भावना पल्लवित होती है।

7-अन्नप्राशन संस्कार (Annaprashan Sanskar)

अन्नप्राशन संस्कार के अन्तर्गत बालक के शारीरिक और मानसिक विकास पर अवधान केन्द्रित किया जाता है। अन्नप्राशन सामान्यतया 6 माह की आयु के आसपास कराया जाता है। बालक के अन्नाहार के क्रम में बालक के व्यक्तित्व का शारीरिक एवं मानसिक विकास संभव होता है।

इससे व्यक्तित्व बलवान और प्रबुद्ध बनता है। तन और मन की सुदृढ़ता अन्न के प्रयोग पर निर्भर है। शब्द, पौष्टिक एवं सात्विक भोजन से ही स्वस्थ तन में स्वस्थ मन का निवास होता है। शुद्ध अधिक और औपटक भोजन से ही तन, मन, बुद्धि, आन्या और अन्त करा का पोषण होता है।

आत्माक सुखानुभूति होती है। सामान्यतया खीर और मिठाई मिष्टात्र से बालक का अन्याहार कराया जाता है। यह संस्कार बालक के दांत निकल आने पर उसे पेय पदार्थ के अलावा खाद्य पदार्थ दिये जाने की सक्षमता का संकेत है।

8-चूडाकर्म या मुण्डन संस्कार (Choodakarm ya mundan Sanskar)

चूडाकर्म संस्कार को मुण्डन संस्कार के रूप में भी जाना जाता है। सामान्यतया पहले, तीमा अथवा पाँचवें साल में मुण्डन Sanskar कराने का विधान माना गया है। बालक के व्यक्तित्व। मस्तिष्कीय विकास व सुरक्षा की दृष्टि से इस संस्कार को महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

इस Sanskar में बालक के सिर के बाल पहली बार उतारे जाते है। इससे जन्म के समय के अपवित्र बाल को निकाल कर बालक के व्यक्तित्व को प्रखर, शुचितापूर्ण तथा प्रबुद्ध बनाने का जतन किया जाता है। नौ माह गर्भस्थ रहने के कारण अपवित्र हुए बालों व टूषित कीटाणुओं को हटाने के लिए यह संस्कार करना आवश्यक होता है। चूडाकर्म संस्कार देव स्थल या तीर्थ स्थान आदि पर भी कराया जा सकता है जिससे वहाँ के दिव्य परिवेश का बालक के व्यक्तित्व पर सकारात्मक प्रभाव पड़े।

9-विद्यारम्भ संस्कार: (Vidyarmbha Sanskar)

विद्यारम्भ संस्कार के अन्तर्गत बालक को शिक्षा के प्रारम्भिक स्तर से परिचित कराया जाता है। यह उल्लेखनीय है कि विद्या या ज्ञान ही मानव के व्यक्तित्व की आत्मिक उन्नति का साधन है। चूडाकर्म या मुण्डन Sanskar तक बालक में सीखने व समझने की प्रवृत्ति जागने लगती है अत चूडाकर्म संस्कार के पश्चात् ही विद्यारम्भ संस्कार श्रेष्ठ माना गया है।

माता-पिता का यह पुनीत कर्नव्य है कि बालक को जन्म देने के साथ-साथ भोजन, वस्त्र आदि की शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद उसकी शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था करे। विद्याराभ संस्कार के विधान द्वारा बालक में समुल संस्कारों की स्थापना की जाती है।

जिसके आधार पर उसकी शिक्षा मात्र ज्ञान न रह कर व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास व जीवन शैली का आधार होती है। विद्या से बालक के व्यक्तित्व में विवेक व सदभाव की शक्ति पल्लवित होती है। विद्यारम्भ संस्कार में अभिरुचि, एकाग्रता एवं श्रमशीलता परम आवश्यक है। विद्या से श्रम, संयम एवं विवेक जैसी महान प्रवृत्तियों को जानन और समुन्नत किया जाता है जिससे बालक के व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त होता है।

10-कर्णवेध संस्कार (Karnvedh Sanskar)

बालक के व्यक्तित्व की व्याधि से रक्षा करने उद्देश्य से कर्णवेध संस्कार का विधान कराया जाता है। कर्णवेधन या कान छेदन से व्यक्तित्व की व्याधियों तो दूर होती ही है साथ ही प्रभावशाली द्रतण शांवत यो विकसित होती है।

कामी में आभूषण धारण करने से व्यक्तित्व के सौन्दर्य बोथ का फल भी मजबूत होता है। सामान्यतया यज्ञोपवीत के पहले काविध संस्कार सापन करने का बिधान है। ज्योतिषयों ने शुक्ल पक्ष के उत्तम शुभ अवसर पर कर्णवेध Sanskar सम्पन्न कराया जाना श्रेष्ठ माना जाता है।

11-यज्ञोपवीत संस्कार (Yaghopveen Sanskar)

यज्ञोपवीत संस्कार को उपनयन संस्कार भी कहाँ जाता है। यज्ञोपवीत सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर व्यक्ति के जीवन में आमूलचूक परिवर्तन के संकल्प का प्रतीक है। व्यक्ति के बौद्धिक के विकास लिए यह अत्यन्त महत्त्व Sanskar माना गया है। धार्मिक और आध्यात्मिक विकास का इस Sanskar में पूर्णरूपेण निहितार्थ होता है। यज्ञोपवीत व्यक्ति की आयु, वल ऊर्जा और तेज पैदा करने वाला होता है।

इस संस्कार से व्यक्ति का जीवन संयमित होता है और आत्मिक विकास को पर्याप्त बल मिलता है। यज्ञोपवीत व्रत बन्ध भी कहलाता है। यह बालक को तब दिया जाता है जब उसकी बुद्धि और भावना का इतना विकास हो जाये कि वह इस सरकार के प्रयोजन को समझ कर उसका निर्वहन कर सके।

यह उल्लेखनीय है कि व्रतो से वन्ध विना मनुष्य के व्यक्तित्व का उत्थान संभव नहीं है। यज्ञोपवीत के नौ धागे नौ गुणा के प्रतीक होते हैं। यज्ञोपवीत से व्यक्तित्व के जिन गुणों का विकास होता है उनमें अनुशासन, शक्ति, आदर्श, निष्ठा, सत्य न्याय, ईमानदारी, निर्मलता, निर्भयता, सन्तोष, शान्ति, निस्पृहता, संवेदना, करुणा, पात्रता, विवेक, समझ, विचारशीलता, निर्णय क्षमता, संयम, धैर्य, ब्रह्मचर्य और सेवा आदि प्रमुख हैं।

12-वेदारम्भ संस्कार: (Vedarmbh Sanskar)

वेदारम्भ Sanskar के विधान से बालक ज्ञान को अपने अन्दर समाहित करने का उपक्रम शुरू करता है। इसे ज्ञानार्जन से सम्बद्ध संस्कार के रूप में स्वीकार किया जाता है। भारतीय मनीषियों ने ज्ञान से बढ़कर दूसरा कोई प्रकाश नहीं माना है। जनेऊ संस्कार के पश्चात् बालक को वेदो का अध्ययन करने एवं विशिष्ट ज्ञान अर्जित करने के लिए प्राचीन काल में योग्य गुरुजनों के पास भेजा जाता था।

गुरुकुलों में वेदारम्भ से पूर्व बालकों को ब्रह्मचर्य व्रत धारण करने एवं संयमित जीवन जीने की प्रतिज्ञा कराई जाती थी। बालक की परीक्षा लेकर ज्ञान के अक्षुण्ण भण्डार के प्रतीक चारों वेदों का अध्ययन कराया जाता था। वेदारम्भ Sanskar द्वारा व्यक्ति के व्यक्तित्व में उन मूल संस्कारों की स्थापना का प्रयास किया जाता है, जिनके आधार पर ज्ञान जीवन निर्माण करने वाली हितकारी व कल्याणकारी विद्या के अर्जन का उपक्रम किया जाता है।

13-केशान्त संस्कारः (Keshaant Sanskar)

केशान्त संस्कार का विधान सम्पन्न होने के पश्चात् गुरु के सामने केशान्त संस्कार कराया जाता है। यह Sanskar वेदों के अध्ययन पूर्ण करके और ज्ञान को अपने अन्दर आत्मसात कर लेने के पश्चात् गुरुजनों व सहपाठियों से विदाई लेने का संस्कार है।

इसके पश्चात् बालक गृहस्थ आश्रम में प्रविष्ट होता है। वेदों, पुराणों, शास्त्रों तथा अन्य समस्त विद्याओं में परिपूर्ण कर बालक को स्नानोपरांत स्नातक की उपाधि से विभूषित किया जाता है। इस संस्कार में स्नान के पूर्व ब्रह्मचारी बालक के केशों (बालों) की सफाई की जाती है। इसलिए इसे केशान्त संस्कार के नाम से जाना जाता है। यह Sanskar शुभ घड़ी में सम्पन्न किया जाता है।

14-समावर्तन संस्कार (Smavtarn Sanskar)

गुरुजनों से विटा लेने के पहले बालक का समावर्तन संस्कार समान कराये जाने का विधान है। समावर्तन Sanskar विधान के पूर्व ब्रह्मचारी बालक का केशान्त संस्कार सम्पन्न कराया जाता तदोपरान्त समावर्तन संस्कार की पवित्र प्रक्रिया में स्नान कराया जाता था।

इस Sanskar के अन्तर्गत वेदी के उत्तर भाग में रखकर आठ पडों में सुगन्धित पदार्थ और औषधियाँ मिलाई जाती हैं और फिर इस घड़ा के जल से मंत्रोच्चार के साथ बालक को स्नान कराया जाता है।

इसके उपरांत बालक यज्ञोपवीत के समय धारण कराये गये ब्रह्मचारी मेखला और दण्ड को छोड़ देता है। इस संस्कार के सम्मान होने पर ही बालक को विद्या स्नातक की उपाधि प्रदान की जाती थी। सुन्दर वस्त्र ग्रहण का व आभूषण पहनता था तथा गुरुओं से आशीर्वाद प्राप्त कर गृहस्थाश्रम में बड़े गर्व व प्रतिष्ठा के साथ प्रवेश करता था।

15-विवाह संस्कार: (Vivah Sanskar)

विवाह संस्कार से समग्र व्यक्तित्व का निर्माण परिपूर्ण होता है। इस Sanskar के अन्तर्गत दो प्राणी पृथक-पृथक अस्तित्वों को समाप्त कर एक सम्मिलित इकाई का निर्माण करते हैं। इस संस्कार के द्वारा दो आत्माओं के मिलने से सृजित होने वाली उस महान शक्ति का निर्माण करना है जो दोनों के लौकिक तथा आध्यात्मिक जीवन के विकास को सफलीभूत करते

इसीलिए विवाह संस्कार को दो आत्माओं के पवित्र बन्धन के रूप में स्वीकार किया गया है। इस संस्कार में पति-पत्नी, सभ्रान्त व्यक्तियों, गुरुजनों, सगे-सम्बन्धियों और ईष्ट-मित्रों की उपस्थिति अपने निश्चय की, प्रतिज्ञाबन्धन की घोषणा करते हैं।

इस प्रतिज्ञा समारोह को ही विवाह संस्कार के रूप में जाना जाता है। विवाह संस्कार से बालक में सामाजिक परम्परा निर्वाह की क्षमता और परिपक्वता आती है बालक समाज से सामंजस्य स्थापित करने लगता है और सामाजिक तथा पारिवारिक नियमों, परम्पराओं और मर्यादाओं का अनुशीलन करने में सक्षम हो जाता है।

16-अन्तिम संस्कार (अन्त्येष्टि) : (Antim Sanskar)

अन्तिम संस्कार को अग्नि परिग्रह संस्कार या अन्त्येष्टि के नाम से भी जाना जाता है। धर्मशास्त्रियों की यह धारणा है कि मृत शरीर की संस्कारयुक्त क्रिया करने से मृतात्मा को शांति मिलती है। इस SANSKAR में सभी स्वजन, सगे-सम्बन्धियों, मित्रो व परिचितों के समक्ष जो कि मृतात्मा को अन्तिम विदाई देने आते हैं,

शव को अग्नि में विधि-विधान से समर्पित किया जाता है। अन्त्येष्टि के तेरहवें दिन शोक-मोह की पूर्णाहुति का विधिवत आयोजन किया जाता है। इसके पश्चात् परिवारजन अपने कर्तव्यों के निर्वहन की ओर पुन ध्यान देते हैं।

निष्कर्ष

उपर्युक्त संस्कारों की सम्पूर्ण विवेचना से यह स्पष्ट है कि संस्कारों को सम्पन्न कराने से सृष्टि की श्रेष्ठ कृति के रूप में मानव के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास संभव होता है। व्यक्ति Sanskarवान बनता है। संस्कारवान व्यक्तित्व अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के कल्याण की ओर प्रवृत्त होता है। व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व के गुण मानवता के कल्याण, अपनी पुरातन संस्कृति, सास्कृतिक और नैतिक मूल्यों के लिए अत्यधिक सार्थक सिद्ध होते हैं। अत: व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास हेतु इन संस्कारों का सादगीपूर्ण आयोजन वर्तमान की अनिवार्यता है।

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2 thoughts on “16 Sanskar, सनातन धर्म में सोलह संस्कारों की संपूर्ण व्याख्या विस्तार से”

  1. Write more, thats all I have to say. Literally, it seems
    as though you relied on the video to make your point.

    You obviously know what youre talking about, why throw
    away your intelligence on just posting videos to your
    weblog when you could be giving us something enlightening to read?

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